हार - जीत :- अशोक वाजपेयी
हार - जीत
वे उत्सव मान रहे हैं। सारे शहर में रोशनी की जा रही है। उन्हें बताया गया है कि
उनकी सेना और रथ विजय प्राप्त कर लौट रहे हैं। नागरिकों में से ज्यादातर को पता
नहीं है कि किस युद्ध में उनकी सेना और शासक गए थे , युद्ध किस बात पर था। यह
भी नहीं कि शत्रु कौन था पर वे विजयपर्व मनाने की तैयारी में व्यस्त हैं। उन्हें सिर्फ
इतना पता है कि उनकी विजय हुई। उनकी से आशय क्या है यह भी स्पष्ट नहीं है:
किसकी विजय हुई सेना की , कि शासक की , कि नागरिकों की ? कसी के पास पूछने
का अवकाश नहीं है। नागरिकों को पता नहीं कि कितने सैनिक गए थे और कितने
विजयी वापस आ रहे हैं। खेत रहनेवालों की सूची अप्रकाशित है। सिर्फ एक बूढ़ा
मशकवाला है जो सड़कों को सींचते हुए कह रहा है कि हम एक बार फिर हर गए हैं
और गाजे - बाजे के साथ जीत नहीं हार लौट रही है। उस पर कोई ध्यान नहीं देता है
और अच्छा यह है कि उस पर सड़क सींचने भर की जिम्मेवारी है , सच को दर्ज करने
या बोलने की नहीं। जिन पर है वे सेना के साथ ही जीतकर लौट हैं।
:- अशोक वाजपेयी
:- अशोक वाजपेयी
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