एक किसान परिवार का दर्द किया था सालों मेहनत हमने, अपने खेतो में खून पसीना बहा कर | खींचा था ठेला, ढ़ोया था बोझा हमने, चिल चिलाती धुप और कड़ कड़ाती ठंडो को सहकर | लेकिन पा न सका एक भी उन खेतो का दाना हमने , जिन के लिए मेहनत किया था हमने खून पसीना बहाया कर। जलवा दिया अनजान दुश्मनों ने फसल का सारा ढेर हमारा, खलिहानो में अकेला पाकर| रोता रह गया पुरा परिवार हमारा, जलता हुआ फ़सलों का ढेर देख कर | धन्यवाद करना चाहता हूँ मैं , गाँव वालों और उन दमकल कर्मियों की, जिन्हों ने सहायता किया हमलोगों की धधकती हुई , आगों की लपेटो को बुझाकर | फसल तो सारी जल ही गई हमारी, चिंता तो बस अब है परिवार के पालन को | बस एक ही बिनती है सरकारी कर्मचारियों से हमारा, दिलवा दें सरकार से कुछ मुआवजा हमें की , कुछ राहत मिलजाए हम अग्नि पड़ित परिवारों ...
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